अनुबंध, कानून द्वारा लागू करने योग्य दो पक्षों के बीच किया जाने वाला एक समझौता है। भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के प्रावधान भारत में बीमा अनुबंध सहित सभी संविदाओं को नियंत्रित करते हैं।
1. बीमा पॉलिसी दो पक्षों यानि कि बीमाकर्ता कहे जानेवाली कंपनी और बीमित कहे जाने वाले पॉलिसीधारक के बीच अनुबंध है और यह भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 में उल्लिखित आवश्यकताओं को पूरा करती है।
2. बीमा अधिनियम, 1938 में हाल में किये गए संशोधनों (मार्च, 2015) में उन स्थितियों के बारे में कुछ दिशानिर्देश प्रदान किये गए हैं जिनके अंतर्गत किसी पॉलिसी पर धोखाधड़ी के लिए सवाल उठाया जा सकता है।
3. वैध कानूनी अनुबंध के तत्व:
a. प्रस्ताव और स्वीकृति
b. प्रतिफल
c. पक्षों के बीच समझौता
d. स्वतंत्र सहमति
e. पक्षों की क्षमता
f. वैधता
4. दबाव - इसमें आपराधिक साधनों के माध्यम से डाला जाने वाला दबाव शामिल है।
5. अनुचित प्रभाव - जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के इच्छा पर हावी होने में सक्षम होगा तो वह दूसरे से अनुचित लाभ उठाने के लिए उस स्थिति का उपयोग करेगा।
6. धोखाधड़ी - जब कोई व्यक्ति गलत विश्वास पर दूसरे को काम करने के लिए प्रेरित करता है जो ऐसी प्रस्तुति के कारण होता है जिसे सत्य नहीं मानना चाहिए। यह तथ्यों के जानबूझकर छिपाव से या उनको गलत तरीके से प्रस्तुत करने के कारण हो सकता है।
7. गलती - किसी के ज्ञान या विश्वास में या किसी वस्तु या घटना की व्याख्या करने में होने वाली तुटि, इससे अनुबंध की विषय-वस्तु के बारे में किये जा रहे समझौते को समझने में गलती हो सकती है।
8. परम सद्भाव या अटमोस्ट गुड फेथ: यह बीमा अनुबंध का एक मौलिक सिद्धांत है। यह चेरम विश्वास भी कहलाता है, जिसका मतलब होता है कि अनुबंध करने वाले प्रत्येक पक्ष बीमा की विषय-वस्तु से संबंधित सभी महत्वपुर्ण तथ्यों का खुलासा करें। सद्भाव व परम सद्भाव में अंतर किया जा सकता है।
9. सद्भाव के पालन करने के लिए कानूनी कर्तव्य के अलावा यह है कि विक्रेता क्रेता को अनुबंध की विषय-वस्तु के बारे में कोई जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है।
10. यहाँ ध्यान देने वाला नियम "देखकर बेचें" हैं जिसका मतलब है, क्रेता सावधान।
11. परम सद्भावः बीमा अनुबंध अलग-अलग आधार पर होते हैं। सबसे पहले, अनुबंध की विषय-वस्तु अमूर्त है और बीमाकर्ता के प्रत्यक्ष अवलोकन या अनुभव द्वारा आसानी से जानी नहीं जा सकती है। इसके साथ ही कई अन्य तथ्य हैं जो अपनी प्रवृति के कारण स्वभावतः केवल प्रस्तावक द्वारा ही जाने जा सकते हैं। बीमाकर्ता को जानकारी के लिए बताई गई बातों पर अक्सर पूरी तरह भरोसा करना होता है।
12. "परम विशवस" की अवधारणा को, "प्रस्तावित किये जा रहे जोखिम के लिए माँगे जाने पर या बिन माँगे सभी तथ्यों को सही तरह से और पूर्ण रूप से स्वेच्छा से बताने के सकारात्मक कर्तव्य" को शामिल करने के रूप में परिभाषित किया गया है।
13. यदि दोनों में से किसी भी एक पक्ष ने परम सद्भाव का पालन नहीं किया तो दूसरा पक्ष उस संविदा को टाल सकता है।
14. परम सद्भाव का उल्लंघन: अब हम उन परिस्थितियों पर विचार करेंगे जो परम सद्भाव के उल्लंघन में शामिल हो सकती हैं। इस प्रकार का उल्लंघन या तो गैर-प्रकटीकरण या गलतबयानी से पैदा हो सकता है।
a. गैर-प्रकटीकरणः यह तब हो सकता है जब बीमित आमतौर पर महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में चुप रहता है क्योंकि बीमाकर्ता ने कोई विशेष जाँच नहीं की है। यह बीमाकर्ता द्वारा पूछे गए प्रश्नों के गोलमोल उत्तर से भी हो सकता है।
b. गलतबयानी: बीमा अनुबंध के लिये प्रक्रिया के दौरान दिया गया कोई भी बयान अभ्यावेदन कहलाता है। अभ्यावेदन तथ्य का सही कथन या विश्वास, इरादे या अपेक्षा का बयान हो सकता है। तथ्य के बारे में यह अपेक्षा की जाती है कि बयान काफी हद तक सही होना चाहिए।
15. 2014 के अध्यादेश में उन स्थितियों के बारे में कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं जिनके तहत किसी पॉलिसी पर धोखाधड़ी का सवाल उठाया जा सकता है।
16. नजदीकी कारण: अंतिम कानूनी सिद्धांत नजदीकी कारण का सिद्धांत है। नजदीकी कारण बीमा का एक प्रमुख सिद्धांत है और इसका मतलब यह जानना होता है कि वास्तव में हानि या क्षति कैसे धारित हुई तथा यह कि क्या यह किसी बीमित आपदा की परिणति है ।
17. नजदीकी कारण को इस प्रकार परिभाषित किया गया है - वह सक्रिय एवं प्रभावोत्पादक कारण जो घटनाओं की श्रृंखलाओं को शुरु करता है और जिसके परिणामस्वरुप कोई घटना घटित होती है और जिसमें नये एवं स्वतंत्र स्त्रोत से शुरु होने वाले किसी बल का कोई हस्तक्षेप नहीं रहता।
18. अनुसरण का अनुबंध: अनुसरण अनुबंध वे अनुबंध होती हैं जो अन्य पक्ष को अनुरसण करने का अवसर देते हुए उस पक्ष द्वारा ड्राफ्ट की गई होती हैं जिनके पास बड़ा सौदेबाजी लाभ है, जैसे कि अनुबंध को स्वीकार या अस्वीकार करना।
19. पॉलिसी लेने के बाद पॉलिसीधारक को फ्री-लुक अवधि दी गई है, जिसे पॉलिसी बाँड मिलने के 15 दिनों के भीतर, असहमति होने पर इसे रद्द कर सकने का विकल्प दिया जाता है।
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